वादों का पहाड़, हकीकत में रेत: न्याय की आस में फिर तहसील पहुंचा कपसाढ़ का पीड़ित परिवार”

 वादों का पहाड़, हकीकत में रेत: न्याय की आस में फिर तहसील पहुंचा कपसाढ़ का पीड़ित परिवार”


 न्याय की आस में फिर तहसील पहुंचा कपसाढ़ का पीड़ित परिवार”



सरधना। थाना क्षेत्र के कपसाढ़ गांव में अनुसूचित जाति के परिवार के साथ हुए सनसनीखेज प्रकरण के बाद किए गए बड़े-बड़े वादों की सच्चाई अब धीरे-धीरे सामने आती नजर आ रही है। घटना के बाद प्रशासन की ओर से राहत और न्याय के कई आश्वासन दिए गए थे, लेकिन समय बीतने के साथ वे वादे कागजों तक ही सिमटते दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि पीड़ित परिवार का संघर्ष अभी भी खत्म होता नहीं दिख रहा। शनिवार को एक बार फिर परिवार तहसील पहुंचा और एसडीएम से मुलाकात कर अपनी पीड़ा सुनाई, लेकिन उन्हें यहां भी निराशा ही हाथ लगी।


पीड़ित नरसी अपने पिता सतेंद्र के साथ तहसील पहुंचा और एसडीएम उदित नारायण सेंगर से मुलाकात कर पहले किए गए वादों को पूरा कराने की मांग की। नरसी का कहना है कि करीब दस मिनट तक चली बातचीत में उनकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकला। उल्टा उन्हें धमकाकर कार्यालय से बाहर निकाल दिए जाने का आरोप लगाया गया है। नरसी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रशासन उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहा और न्याय दिलाने के बजाय मामले को टालने की कोशिश की जा रही है।


गौरतलब है कि आठ जनवरी की सुबह कपसाढ़ गांव में यह मामला उस समय सुर्खियों में आया था, जब अनुसूचित जाति के नरसी की बहन रूबी का गांव के ही पारस सोम नामक युवक द्वारा कथित रूप से अपहरण कर लिया गया था। इस घटना का विरोध करने पर आरोपित ने नरसी की मां सुनीता पर धारदार हथियार से हमला कर दिया था। गंभीर रूप से घायल सुनीता को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई थी। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश पैदा कर दिया था और मामला राजनीतिक रूप से भी काफी संवेदनशील हो गया था।


घटना के बाद प्रशासन और पुलिस ने हालात को शांत करने के लिए कई बड़े आश्वासन दिए थे। पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता, पिस्टल का लाइसेंस, भूमि का पट्टा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दिलाने की बात कही गई थी। उस समय दस लाख रुपये की आर्थिक सहायता जरूर दी गई, लेकिन बाकी वादे अब तक पूरे नहीं हो सके हैं। नरसी का आरोप है कि घटना के समय प्रशासन की ओर से पचास लाख रुपये की आर्थिक मदद का आश्वासन दिया गया था, जो अब तक अधूरा ही है।


नरसी ने यह भी बताया कि सकौती शुगर मिल में उन्हें नौकरी दिलाने की बात कही गई थी, लेकिन वह भी सिर्फ एक दिन की औपचारिकता बनकर रह गई। जब उन्होंने मिल के अधिकारियों से अपने पद और वेतन के बारे में जानकारी मांगी तो उन्हें स्थानीय प्रशासन से बात करने की सलाह दे दी गई। इससे परिवार को यह महसूस हुआ कि नौकरी दिलाने का दावा भी केवल कागजी कार्रवाई तक ही सीमित था।


इतना ही नहीं, नरसी ने आरोप लगाया कि मिल अधिकारियों ने साफ तौर पर कहा कि कपसाढ़ प्रकरण को शांत कराने के लिए प्रशासन के कहने पर उन्हें केवल एक माह के लिए नौकरी पर रखने की बात कही गई थी। यह सुनकर परिवार को गहरा आघात लगा, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि नौकरी के माध्यम से परिवार का भविष्य कुछ हद तक संभल सकेगा।


अब पीड़ित परिवार ने प्रशासन से निराश होकर नगीना से सांसद चंद्रशेखर से मिलकर न्याय की गुहार लगाने का फैसला किया है। परिवार का कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर उन्हें न्याय नहीं मिलता है तो वे अपनी लड़ाई बड़े स्तर पर उठाएंगे।


हालांकि, दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारियों ने पीड़ित द्वारा लगाए गए धमकाने के आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। अधिकारियों का कहना है कि पीड़ित की बात सुनी गई है और मामले में आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।


फिलहाल सवाल यही उठ रहा है कि घटना के बाद किए गए बड़े-बड़े वादे आखिर कब तक पूरे होंगे या फिर यह मामला भी सिर्फ आश्वासनों की फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।

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